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संपादकीय l अंक 34

साहित्य हो अथवा इतिहास, समाजशास्त्रा, नृतत्वशास्त्रा, अर्थशास्त्रा जैसे समाज विज्ञान के विषय, सभी अंततः नए पुराने किसी न किसी समाज के स्वरूप का उद्घाटन और विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। कोई समाज कैसा है, इसे सामने लाने की प्रक्रिया में प्रायः उसकी सभ्यता, संस्कृति, आर्थिक संरचनाओं की विवेचना होती है। ऐसे ही रास्तों के जरिये दुनिया में उन अनेक महान विचारों, विचारधाराओं, ग्रंथों ने जन्म लिया जो न केवल असंख्य मनुष्यों की चेतना के निर्माता, संवर्धक बने बल्कि उन्होंने ऐसे अनेक अविस्मणीय आंदोलनों, क्रांतियों के लिए जमीन तैयार की जिससे बड़े बड़े बदलाव मुमकिन हो सके।  उपर्युक्त संदर्भ में प्रश्न उठता है कि साहित्य और समाज विज्ञान जब किसी समाज तथा उसके समय विशेष का मूल्यांकन करते हैं अथवा उसकी उत्कृष्टता या अधमता को लेकर अपना निर्णय सुनाते हैं तो कसौटी क्या रहती है? यूं भी कह सकते हैं कि किसी समाज के वास्तविक चरित्रा को पहिचानने के क्या तरीके हैं? प्रायः समृद्धि, विकास, सांस्कृतिक वैभव, मानव संसाधन, श्रम विभाजन, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य सुविधाएं, नागरिक अधिकार, खुशहाली आदि वे मानक हैं जिनके आधार पर समाज, व्यवस्था, प्रशासन, राज्य का यथार्थ प्रगट होता है।  लेकिन एक अन्य बटखरा है जो वास्तविकता को उजागर करता है, वह यह कि किसी राज्य या समाज में जो सत्ता है उसके द्वारा नियंत्रित, आयोजित साधारण जनता के शोषण एवं दमन का स्तर तथा चेहरा क्या है? यह अमूमन सत्यान्वेषण की दिशा में अचूक परिणाम देने वाला एक रामबाण उपाय है और इससे जो नतीजे सामने आते हैं वे कई बार प्रचलित अवधारणाओं के अनुरूप रहते हैं लेकिन कभी कभी वे इस कदर विस्फोटक होते हैं कि सच्चाई की सर्वथा विपरीत तस्वीर सामने आती है।

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